
दक्षिणी दिल्ली की एक चौड़ी सड़क और इस सड़क पर कुलांचे भरती महंगी कारें, इलाके की समृद्धि को रेखांकित करवा रही थी। हवा के झोंके को लिए सरपट दौड़ती ये मोटरगाडियां पलक झपकते ही ओझल हो जाती हैं। फिर नई कारें...उसी गति से। सड़क के किनारे हाथ में डायरी थामे मैं भी इस भागती हुई दिल्ली के साथ, भागने की असंभव कोशिश कर रहा था। थोड़ी–सी सड़क नाप कर मैं यकायक रुक गया। अपनी पीठ को महंगी कारों की ओर करके खड़ा हो गया। सामने करीब 30 वर्षीय छरहरा नौजवान बैठा था। उसकी आंखे मुझे एक कल्पित ग्राहक के रूप में देख रही थी।
क्षणभर में इस नोजवाँ को अंदाजा लग गया कि मैं कोई खरीददार नहीं एक यूट्यूबर ही हूं!मेरे जैसे बीसियों कैमाराधारी पहले यहां आ चुके हैं। जो उसकी गरीबी को बेचकर वाहवाही लूटते हैं। उम्मीद की ओट ने एक बारी फिर उसे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार कर दिया। किशन नाम बताया अपना। किशन, गाड़िया लोहार हैं जो कि घुमंतू जनजाति है। मूलतः ये जाति राजस्थान और मध्यप्रदेश के मालवा इलाके की है।
दो पैसे कमाने की उम्मीद से राजधानी दिल्ली आये थे। पुश्तैनी काम लोहारी है। लेकिन जैसे आये थे आज भी वैसे ही हैं। गुलजार साहेब के शब्दों में कहें तो न घर है न ठिकाना। घर के नाम पर फुटपाथ पर बने दो छप्पर हैं, पांच बाई आठ के। जिस पर पता नहीं कब बुलडोजर की गूंज गरजने लग जाए।
एक कमरे में उनके भाई रहते हैं और एक में किशन का परिवार, दो बेटियां और उनकी पत्नी। इसी छप्पर में नहाते हैं, इसी में खाना–पीना और यहीं सोना। किशन के पिता हरपु छप्पर के बगल में खुले फुटपाथ पर सो जाते हैं। दिल्ली की सर्दी शायद उन्हें नहीं ललकारती होगी! उनका जिंदा बचे रहना उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा हासिल है।

मैंने किशन से पूछ लिया कि जिंदगी में क्या करने का सपना है? सवाल को सुन कर चेहरे पे उदासी छा गई, नजरे फेर कर जवाब दिया.. कुछ नहीं बच्चों को पढ़ाना है। फिर लंबी खामोशी हमारे बीच आ गई। चुप्पी को तोड़ने की चाह में दूसरा प्रश्न पूछा, खुद का घर हो ऐसी कोई ख्वाहिश या सपना है? सपना तो है ही कहते हुए आंखें भर आईं, आवाज़ में भारीपना आ गया। किशन ने बताया कि उन्हें राशन प्रणाली का फायदा नहीं मिलता। पानी के लिए दूर टैंकर आता है, वहां से उठा कर लाना होता है। किशन जैसे किशोर सरकारी अधिकारियों के लिए अपशगुन होते हैं। क्योंकि इनकी आमदनी मुश्किल से चार पांच सौ के आंकड़े तक पहुंच पाती है।
किशन, वोट देते हैं। उनके पास मतदान का अधिकार है। पर हर मत की कीमत बराबर थोड़े ही है। बराबर करने का सपना भीमराव आंबेडकर का था, वो अब नहीं रहे।
गाड़िया लोहारों के कई परिवार दिल्ली के फुटपाथ पर जीवन बसर कर रहे हैं। सबकी यही कहानी है। अंगरेजों के समय में जन्मजात अपराधी का खिताब इन्हें मिला था। आजादी मिली पर आधी रात को, इन परिवारों के लिए आजादी का सवेरा हुआ ही नहीं। हाल ही में जय भीम फिल्म और दिल्ली क्राइम सीजन 2 में ऐसी ही जनजातियों के दर्द को उकेरा गया है।
अधिकतर गाड़िया लोहार हिंदू हैं। लेकिन कुछ परिवार मुस्लिम मजहब को मानते हैं।
वर्ष 2006 में यायावर आबादी के लिए आयोग का गठन किया गया। आयोग के अध्यक्ष बालकृष्ण रेंके ने दयनीय स्थिति को देश के सामने रखा। इन परिवारों को मूलभूत संवैधानिक आधिकारों से वंचित रखा गया था। वर्ष 2014 में हुकूमत ने कल्याण बोर्ड के गठन की घोषणा की थी। पिछले वर्ष ही संसद की समिति ने चिंता जाहिर की। क्योंकि जनजातीय परिवारों के लिए शुरू की गई योजना का एक आना भी खर्च नहीं हुआ था।
दूर से बैलगाड़ी पर भटक रहा परिवार आम जन को (जिसका पेट भरा हुआ है) रोमांचित करता है। आकर्षण का फितूर तब उतर जाता है जब किशन जैसे युवाओं की खाली आंखें सवाल पूछती हैं मेरी आजादी कहां है? मेरा घर कहां है? मेरी निजता, मेरा स्वाभिमान कहां?
कहने को क्या है हमारे पास?

















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