
शीर्षक से आपने अंदाज़ा लगा लिया होगा, यह एक कहानी है। आप कहानी को कहानी की तरह ही पढ़ें, इतिहास नहीं। हालांकि, आज–कल एक नया चलन शुरू हुआ है, इतिहास की जगह मनोरम कहानियां ले रही हैं।
खैर! यह कहानी मेरी दादी ने मुझे बचपन में सुनाई थी। मैं उस कहानी को आपके साथ साझा कर रहा हूं। बिना लाग–लपेट के। तो अब मैं अपने ‘मैं’ को थैले में रख आपका त'आरुफ़ सीधा दादी की कहानी से करवाने जा रहा हूं।
.......दुनिया के सुदूर छोर पर नीले सागर के बीचो बीच एक द्वीप था। जिसका नाम था गधा प्रदेश। यह कथा, गधा प्रदेश में रहने वाले गधों की है। गधा प्रदेश के चहुंओर पानी फैला हुआ था। पर जमी के एक छोटे–से हिस्से में पसरे हुए गधे भी आपस में बंटे हुए थे। एकता का घोर अभाव।
अमावस की एक काली रात में सारे गधे सोए हुए थे। पूरे गधा प्रदेश में अंधेरा छाया हुआ था। यहां तक की समंदर की लहरों में भी उदासी छाई हुई थी। लेकिन अंधेरा स्थाई नहीं रहता। उसे एक दिन छंटना ही होता है....भोर होता है। भोर में समंदर की लहरों ने कुछ मेहमानों को ढोते हुए द्वीप के दरवाजे पर छोड़ दिया। ये भी गधे ही थे लेकिन इन गधों की चमड़ी चिकनी थीं। एकदम मलमल जैसी। इन गधों के हाथ में एक डिब्बा था जिस पर लिखा था केरोसिन। मूल गधों को चिकनी चमड़ी के गधों ने आकर्षित किया, सम्मोहित किया। मूल गधे मेहमानों की खिदमत करने लग गए।

कुछ वक्त बाद चिकनी चमड़ी वाले गधों ने चालाकी से मूल गधों को गुलाम बना दिया। मूल गधों की मासूमियत और अलगौझे का नतीजा था गुलामी। अब मूल गधों को चिकनी चमड़ी वाले गधों के आगे जी हुजूरी करना था।
कहते हैं कि चिकनी चमड़ी वाले गधे जागते हुए अंदर मूतते थे। यानी नतीजा ज्ञात होने के बावजूद अनजान बने रहने की कोशिश करते थे। उन्होंने केरोसिन के डिब्बों को चिंगारियों पर उलट दिया। चिंगारियों ने आग की लपटों का रूप धर लिया। पर ऐसा क्यों किया? अपनी सत्ता को कायम करने के लिए। सत्ता बलिदान मांगती है। अच्छा मूल गधे भी अगर आपस में मार काट नहीं करते तो चिंगारियां उठती ही नहीं। पर मूल गधे बहकावे में आ जाते हैं।
अरसे बाद मूल गधों में होश आया। चिकनी चमड़ी वाले गधों के अब दिन लदने वाले थे। क्योंकि मूल गधों में चिकनी चमड़ी वाले गधों के प्रति बसा अथाह प्यार धीमा पड़ रहा था। धीरे–धीरे, मूल गधों ने बिना गाली दिए गुलामी की डोर को उखाड़ फेंका। चिकनी चमड़ी वाले गधे गोधूली बेला की धुंध में समंदर की ओर लौट गए।

चिकनी चमड़ी के गधों से दमित मूल गधे एक थान पर इकट्ठा हुए। अब मूल गधे दूध के जले छाछ को फूंक–फूंक कर पीने की कहावत को चरितार्थ कर रहे थे। कोई ऐसी चूक ना हो जिससे गुलामी की घुटन में फिर से जीना पड़े।
गधों ने मिलकर एक गधे को चाकरी के लिए चुना। शब्द पर गौर कीजिए! यहां गधे चाकरी के लिए चुन रहे हैं। चुने गए गधे का नाम था ‘चाकर’।
चाकर बड़े उम्दा दर्जे का गधा था। उसने अपने वतन गधा प्रदेश के लिए चाकरी की। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं की चाकर में कोई कमी नहीं थी। था तो यह भी गधा। कहीं न कहीं, कभी न कभी अपने पैरों से धूल उछाल ही दी होगी।
चाकर, जैसे ही चाकरी करने निकला उसे मुसीबतों से जूझना पड़ा। इतनी बड़ी गधों की संख्या में गधों की चाकरी अकेले से नहीं की जा सकती थीं। गधों नें चाकर पर विश्वास किया। चाकर ने उस विश्वास के बल पर चाकरी करने के लिए गधों की अलग-अलग टोलियां बना दी।
गधों की एक टोली का काम इस बात की देखरेख करना था कि किसी गधे के साथ भेदभाव नहीं हो। हर गधे का वतन में बराबर हक है। ना कोई गधा मोटा है और ना ही छोटा।
ऐसे ही गधों की एक और टोली का गठन किया। यह टोली थोड़ी सी अजीब थी। इस टोली में शामिल गधों के नाक पर भोपू बांधा हुआ था। इन गधों का काम था चाकर को उसकी औकात दिखाना। यानी चाकर को बार-बार यह याद दिलाना कि आपका काम पूरी बिरादरी की चाकरी करना है।

भोपू वाले गधों की समाज में बहुत इज्जत थी क्योंकि यह सत्ता के सामने खड़े हो जाते थे, गधों के हित में। सत्ता जिसके पास होती है उसे सहूलियत होती है, उसका दबदबा होता है। लिब्रुओं की भाषा में कहें तो उसका भौकाल होता है। बताओ जरा, ऐसी चीज को कौन जरा प्यार नहीं करेगा। पर इसमें खतरा भी है। सत्ता के प्रेमियों में खुद की आवाज़ मर जाती है। वो, वही राग अलापते हैं जो सत्ता को पसंद आती है।
पर भोंपू धारी गधों की जमात में सत्ता को चिमटे से छूना भी पाप है। और इसी त्याग का सम्मान समाज करता है।
ये फालतू का बकवास था। गधा प्रदेश में वापस आते हैं। चाकर ने खूब मेहनत की। उसने गधों के प्रदेश यानी गधा प्रदेश में गधों के सेवा–चाकरी के लिए मजबूत नींव रखी। लेकिन एक दिन तड़के अचानक चाकर गधा फानी हो गया। कहानी सुनाते सुनाते दादी की आवाज़ में थोड़ा भारीपन आया। जैसे कोई आवाज़ को रोक रहा हो। पर कहानी कभी रुकती नहीं।

चाकर के जाने के बाद गधों ने धीरे–धीरे उस नींव पर मकान बनाया। देस में रहने वाले हर गधे का महत्त्व था। चाकरी करने वाले के पास किसी भी तरह के भेदभाव की छूट नहीं थी। पर समाज भी बदलाव लाता है। अच्छे–बुरे।
चिकनी चमड़ी के गधों को गुजरे काफी वक्त हो गया था। समाज ने अपनी सहूलियत के हिसाब से नियम बदल दिए। कुछ उत्पाती गधों ने केरोसिन के डब्बों को खोल दिया। धुआं उठा। गधों ने चाकरी करने के लिए एक नए गधे को चुन लिया। नए वाले गधे का नाम था दरवेश। पूरा नाम दरवेश गधेराज।
दरवेश सिंगार का बहुत शौकीन था। उसे रोज नई मिट्टी में लिपटना पसंद था। पर दरवेश यह भूल गया था कि उसका मूल काम चाकरी करना है।
दरवेश को औकात दिखाने के लिए भोंपू धारी गधे आते है। उनकी आवाज़ दरवेश के कानों में चुभने लगती है। दरवेश ने फौरन दूर भागने का आदेश दिया।
गधेराज को अब एक तरह की राग ही पसंद थी। दूसरी राग सुनते ही वो तमतमा उठता था। उसके आस–पास की मंडली में सब एक ही राग अलापते थे... ईइइइइ... होहो

भोंपू वाले गधों के कारण दरवेश सत्ता सुख भोग नहीं पा रहा था। तंग दरवेश एक दिन अपने महल में सो रहा था। तभी उसे एक सपना आया। सपने में सत्ता का मद दिखा। सुबह उठकर, कानों में चुभने वाली राग को अपने जैसी बनाने के लिए मद (सत्ता/पुरूस्कार) का लालच दिखाना शुरू किया। सत्ता के आकर्षण ने कई बैरागियों को अपनी ओर खींच दिया, अपने पाले में कर दिया। अब इनकी राग भी दरवेश के साथ मिल रही थी। दरवेश ने गाना गुनगुनाया मिले सुर मेरा तुम्हारा.....
पर अब भी दरवेश को चैन कहां। रीड की हड्डी वाले गधे सत्ता के पुरस्कारों की लालच में फसने वाली नहीं थे। उनमें से कुछ भोंपू वाले गधे भी थे। दरवेश को अब इनकी आवाज और ज्यादा चुभ रही थी। दरवेश का चेहरा गुस्से से नारंगी हो जाता था।
एक दिन दरवेश की टोली के गधों ने कुलांचें मारते हुए एक भोंपुधारी गधे को घेर दिया। पुरस्कारी गधे सत्ताविहीन निर्बल गधे पर टूट पड़े। धाय–धाय की आवाज़।....पूरे द्वीप में खामोशी। समाज ने आंखे मूंद ली। दरवेश खुश हुआ। पर आवाज़ तो अब भी आ रही थीं। और जोर से।

गधों के वतन में गधे आपस में बंटे गए थे। दरवेश की चाकरी, सत्ता का रूप ले चुकी थी। कितना दुखद है, द्वीप एक, हवा एक, धान एक, खून एक पर गधे बंटे हुए हैं ... कई गधों के पास अंगरेजों की निशानी– केरोसिन वाले डिब्बे हैं।
इस डरावने माहौल के बीच कुछ शांति प्रिय गधे एक गांव के गोचर में, जाड़े की सुबह में, राख में लिपटने के लिए आते हैं। तभी तेरे दादा वहां से गुजर रहे थे उन्होंने गधों से कहा.... मियाँ कुछ पढ़ो लिखो
गधा बोला– जनाब हो गई बे-इज़्ज़ती तो फिर
बे-इज़्ज़ती भी ठीक है लेकिन जनाब-ए-मन पढ़ लिख के बन गया मैं अगर आदमी तो फिर
इस शेर को सुनने के बाद मुझे नींद आ गई....नहीं! मैं अर्थ समझने की कोशिश करने लगा...
















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